Sunday, July 17, 2011

प्यार तो ज़िन्दगी का अफसाना है!

प्यार तो ज़िन्दगी का अफसाना है!
इसका अपना ही एक तराना है!
पता है सबको मिलेंगे सिर्फ आंसू!
पर न जाने दुनिया में हर कोई क्यों इसका दीवाना है!

Saturday, July 16, 2011

बॉलीवुड में बुंदेलखंड का डंका बजाने की चाहत

झांसी। बुंदेलखंडी फिल्मों में सिक्का जमा चुके देवदत्त बुधौलिया अब टीवी सीरियल के रास्ते बॉलीवुड में बुंदेलखंड का डंका बजाने में जुटे हुए हैं। आने वाले दिनों में हिन्दी फिल्मों में भी वह अभिनय करते दिखेंगे, लेकिन अपनी मिट्टी की सौंधी सुगंध को फैलाने यानी बुंदेलखंडी फिल्म इंडस्ट्री को पहचान दिलाने का प्रयास भी जारी रहेगा।
‘ढड़कोला’ और ‘बुंदेलखंडी डॉन’ फिल्म में अपने सधे अभिनय के बूते अपनी अलग पहचान स्थापित करने वाले देवदत्त इन दिनों कलर्स, एनडीटीवी इमेजिन, स्टार प्लस, सहारा वन आदि चैनलों पर चल रहे कई सीरियल में अलग- अलग किरदारों में अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दे रहे हैं। एनडीटीवी इमेजिन पर प्रसारित शाकुंतलम प्रोडक्शन द्वारा निर्मितधारावाहिक ‘देवी’ में ग्रामीण की भूमिका में वह अपने अभिनय का नया आयाम स्थापित कर चुके हैं। वहीं, कलर्स पर प्रसारित सीरियल ‘ये प्यार न होगा कम’ में एक गरीब रिक्शावाले की भूमिका में वह दर्शकों को बांधने में सफल रहे। इसी चैनल पर प्रसारित बहुचर्चित सीरियल ‘लाडो’ में भगनू के किरदार में उनके जीवंत रोल को लंबे समय तक लोग याद रखेंगे। एनडीटीवी इमेजिन पर प्रसारित धारावाहिक ‘काशी’ में नौकर बने देवदत्त अपने किरदार से यूं घुल मिल गए दिखे मानो यह पात्र उन्हीं के लिए रचा गया हो। इसी तरह, स्टार प्लस पर ‘राजा की आएगी बारात’ में भी वह अपने अभिनय का अमिट छाप छोड़ने में सफल रहे हैं। सहारा वन पर प्रसारित धारावाहिक ‘छोटी बहू’ और ‘गणेशलीला’ तथा कलर्स पर ‘ऐसे न करो विदा’ में भी अलग- अलग किरदारों में वह दिख चुके हैं। आने वाले दिनों में वह सोनी पर प्रसारित ‘सीआईडी’ और ‘आहट’ में भी दिखेंगे। इसके लिए आडिशन दे चुके हैं।
बुंदेली फिल्मों में बतौर हीरो काम करने वाले देवदत्त धारावाहिकों में चरित्र भूमिकाएं निभाने के सवाल पर कहते हैं कि उनके आइडियल शाहरुख खान भी सर्कस जैसे सीरियल के माध्यम से फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने में सफल रहे थे। उनके लिए भी ये टीवी धारावाहिक फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने का एक जरिया हैं। वह बताते हैं कि इरफान खान की फिल्म में लीड रोल के लिए उनका आडिशन लिया गया था, जिसमें वह सफल रहे हैं। अभी इसका नाम तय नहीं किया गया है, लेकिन जल्द ही यह फिल्म फ्लोर पर होगी। बुंदेली भाषा में बनी फिल्म ‘मकान आपका, हमारे बाप का’ भी जल्द ही रिलीज होगी। इसके अलावा ‘मां वैभव लक्ष्मी’ भी रिलीज होने वाली है। इस फिल्म में उनके साथ जाने- माने भजन गायक अनूप जलोटा भी हैं, जो उनके गुरु की भूमिका में हैं। वह बताते हैं कि मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ में भी उन्हें अभिनय का मौका मिला। उन्हें यह स्वीकार करने में झिझक नहीं कि अभी बुंदेलखंडी फिल्म इंडस्ट्री शैशवावस्था में है। इसके लिए इस क्षेत्र के राजनीतिज्ञों और कलाकारों को ठोस पहल करनी होगी। समवेत पहल से भोजपुरी फिल्मों की तरह बुंदेलखंडी फिल्मों का भी अपना मार्केट होगा और यहां के कलाकार भी देश- विदेश में अपनी पहचान कायम करने में सफल रहेंगे। वह बताते हैं कि ढड़कोला को वह सीरियल के तौर पर एक बार फिर से दर्शकों के सामने लाना चाहते हैं। इसके लिए बालाजी फिल्म्स की सर्वेसर्वा एकता कपूर को उन्होंने प्रस्ताव दिया है। सब कुछ ठीक रहा तो तेरह एपीसोड में धारावाहिक के रूप में इसे प्रसारित किया जाएगा।

- कुमार भवानंद

जिज्ञासा से शुरू होता है जीवन: श्री श्री रविशंकर

आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर ने कहा कि हमारा जीवन जिज्ञासा से शुरू होता है। उन्होंने मोक्ष और पुनर्जन्म की अवधारणा को भी अपने अंदाज में परिभाषित किया, वहीं यह भी कहा कि चित्त शांत हो तो प्रेम हासिल करना मुश्किल नहीं है। महासत्संग में हिस्सा लेने झांसी आए योग व अध्यात्म गुरु नेे अध्यात्म व धर्म सहित विभिन्न समसामयिक मुद्दे पर लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश:
जीवन क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
- जिज्ञासा से मानव जीवन शुरू होता है। पूर्णत्व प्राप्त करने पर ही मानव पूर्ण आकार लेता है। जीवन साधना सिखाती है। साधन सामग्री जुटाने में ही जीवन गुजारना इस मानव जीवन का उद्देश्य नहीं है।

मोक्ष और पुनर्जन्म की अवधारणा में विरोधाभास क्यों है? आत्मा अजर -अमर रह कर देह में प्रवेश करती हो तो फिर मोक्ष कहां मिला?
- इसमें विरोधाभास जैसी कोई बात नहीं है। आत्मा की मर्जी से ही मुक्ति मिलती है। जन्म से मुक्ति की इच्छा जुड़ी है। मुक्ति की इच्छा जिसमें नहीं जगती उसमें भक्ति जागृत होती है।

आप अक्सर अपने सत्संग के दौरान कहते हैं कि प्रेम ही सबसे बड़ा तत्व है। आज की आपाधापी भरी जीवन शैली में प्रेम कैसे पैदा हो?
- प्रेम जीवन के लिए वाकई सबसे बड़ा तत्व है। लेकिन, यह बेहोशी की हालत में पैदा नहीं हो सकता है। प्रेम पैदा करने के लिए आपाधापी भरी जीवन शैली कतई बाधक नहीं है। होश में रहें तो प्रेम की धारा स्वत: बहेगी।

क्या आप मानते हैं कि उपदेशों का लोगों पर प्रभाव पड़ता है? यदि हां तो फिर क्या कारण है कि सन 2002 में आपकी बिहार यात्रा के दौरान रणवीर सेना, सीपीआईएम, पीपुल्स वार ग्रुप तथा माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के एक लाख युवाओं ने अहिंसा के संदेश के प्रचार की प्रतिज्ञा की। इन लोगों ने प्रतिज्ञा को निभाया तो फिर नक्सलवाद क्यों नहीं थमा?
- उपदेश का प्रभाव पड़ता है। कौन कहता है कि बिहार में नक्सलवादियों की गतिविधियां नहीं थमीं। उनके सत्संग के बाद से क्या बिहार में कभी नरसंहार की घटनाएं सामने आईं? वहां पहले बड़े - बड़े नरसंहार हो चुके थे। सत्संग के बाद एक हजार से अधिक नक्सली देश की मुख्य धारा में जुड़े। मणिपुर, झारखंड जैसे राज्यों में हिंसा की घटनाएं काफी कम हो चुकीं हैं। उग्रवादी संगठन से जुड़े मणिपुर के कई लोगों को पुने आश्रम में रख कर उन्हें समाज से जुड़ने के लिए प्रेरित किया गया है। इतना ही नहीं तीन सौ से अधिक लोगों को असम राइफल्स के कैंप में रख कर उन्हें जीवन जीने की कला सिखाई गई है। कार्ल मार्क्स की विचारधारा यदि उनके दिमाग में पैठ सकती है तो क्या देश के प्रति उनकी जिम्मेदारी की बात नहीं बैठ सकती है। हमने उन्हें यही बताया है। नतीजा हर स्थान से सकारात्मक आए हैं।

क्या सुदर्शन क्रिया हमें सभी रोगों से मुक्त करने में सक्षम है?
- सुदर्शन क्रिया से कैंसर और तनाव खत्म होने के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। एम्स और निमहैन्स के चिकित्सा विशेषज्ञ इसे कसौटी पर कसने में जुटे हैं। योग को मेडिकल साइंस ने भी मान्यता दी है। अब तो चिकित्सक भी रोगियों को योग की सलाह देते हैं। वैसे भी हम क्वांटम फिजिक्स को क्यों भूल जाते हैं।

क्या आपको लगता है कि एक दिन आप अपनी बात लोगों को मानने को विवश कर देंगे। यदि हां, तो वह दिन कब आएगा?
मैं कभी भी लोगों को किसी बात के लिए विवश नहीं करता। उन्हें बताता हूं। जैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम में किसी से जीवन पर्यंत रिश्वत नहीं लेने की शपथ कभी नहीं दिलाता। उनसे सिर्फ एक साल तक की शपथ लेने की बात कहता हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि अधिसंख्य लोग एक दिन पूरी तरह से भ्रष्टाचार या अन्य सामाजिक बुराइयों से खुद को दूर कर लेंगे। जहां तक शत प्रतिशत लोगों की बात है इसे लेकर वह कोई दावा नहीं करते। स्प्रिचुअल प्रैक्टिस से विचारधारा जमती है।

किसी वस्तु की इच्छा क्या अनुचित है?
इच्छा ही जीवन नहीं है। जीवन इससे भी महत्वपूर्ण है। इच्छा की पूर्ति होने पर क्या इच्छा थम जाती है? नहीं न। वस्तुत: यह और विस्तार पाती है।

अन्य संतों, महात्माओं, योगियों से आप अपने को कैसे अलग मानते हैं? आजकल फर्जी और तिकड़मी गुरुओं की भरमार है। क्या ऐसे लोगों की वजह से गुरु- शिष्य परंपरा की वैदिक परंपरा खत्म नहीं हो जाएगी?
फर्जी गुरु तो हर काल में रहे। रावण को हम क्यों भूल जाते हैं, जिन्होंने छल कर सीता का अपहरण किया था। गुरु- शिष्य की परंपरा कभी खत्म नहीं होगी।

उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड को लेकर आपकी संस्था क्या कदम उठाएगी?
इस समय तो हम उत्तर प्रदेश की बात कर रहे हैं। सोनभद्र से इसकी शुरुआत हो चुकी है। झांसी से मैं खुद इस अभियान का आगाज कर रहा है। उत्तर प्रदेश जातिवाद से बुरी तरह से जकड़ा हुआ है। इसी कारण यहां विकास की गति थम गई है। बुंदेलखंड के लिए भी हम सोचेंगे। बरुआसागर में लोगों की काफी मांग रही है। जमीन व अन्य सुविधाएं मिलीं तो हम कुछ अच्छा करेंगे, लेकिन इस समय ठोस तरीके से कुछ भी कहना संभव नहीं हो पाएगा। अब तक यूपी पर फोकस नहीं करने का मुख्य कारण यहां कार्यकर्ताओं का अभाव रहा है। अब लोग सामने आने लगे हैं।

-कुमार भवानंद