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Saturday, July 29, 2023
छह फुट की झोपड़ी, बांस से बने मचान, इस पर साथ - साथ सोते पशु और इंसान
Tuesday, October 20, 2020
बिहार चुनाव 2020
हेडिंग::
बक्सर में का बा...
बिहार चुनाव... बक्सर
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ब्रह्मपुर, डुमरांव,राजपुर और बक्सर के चुनावी बिसात पर एनडीए और महागठबंधन के प्रत्याशियों को लोजपा और बागियों की टेढ़ी चाल कर रही परेशान
कुमार भवानंद
बक्सर। बक्सर में का बा...बेरोजगारी, अशिक्षा, जातपात,टूटल सड़क और झूठे वादों के ढेर बा। का..का बताईं। हमनी के त हरमेस ठगाइल बानी जा, कबो केहू हमनी के न सुनल, अब केहू से उम्मेद भी नइखे। पढ़ल- लिखल लोग भी चुनावी बयार में बह जाला, निमन प्रतिनिधि ना चुने ला लोग। ... इन पंक्तियों पर गौर कीजिए। बक्सर जिले का ब्रह्मपुर विधानसभा क्षेत्र हो, राजपुर, डुमरांव या फिर बक्सर सदर क्षेत्र... सभी स्थानों के मतदाताओं की यही पीड़ा है। इस क्षेत्र की गौरवशाली परंपरा पर हम गर्व कर सकते हैं, लेकिन वर्तमान...बेहद अफसोसजनक। सत्ताधारी दल के नेताओं ने छला तो विपक्ष में बैठे लोगों ने भी दुखती रग को सहलाने का कोई काम नहीं किया। मतदाताओं में उम्मीद से अधिक निराशा का भाव। और यही यहां की सबसे बड़ी चिंता। यानी, चाहत तो बदलाव की, पर विकल्प क्या? बेबाकी के लिए मशहूर यहां के अधिकतर लोग इस बात पर चुप्पी साध ले रहे हैं। कुछ यह कहते हुए कन्नी काट लेते कि ...देखल जाई चुनाव के दिन।
क्षेत्र में प्रत्याशियों की आमदरफ्त अभी बेहद कम है। शायद यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोग अभी दलीय प्रत्याशियों के नाम भी सही - सही नहीं ले पाते हैं। बड़े नेताओं की चुनावी सभा संभावित है। संभव है कि इसके बाद चुनावी फिजां में और निखार आए। चुनाव आयोग की बढ़ती सख्ती के कारण कहीं किसी दल या प्रत्याशी का चुनाव चिह्न युक्त झंडा या पोस्टर तो नहीं दिखता, लेकिन उनके समर्थक मतदाताओं के मन को टटोलने में जुट गए हैं। हां, एक बात स्पष्ट रूप से दिख रही है कि लोकसभा चुनाव की तरह एकतरफा मुकाबला कहीं नहीं होगा। जीत- और हार के बीच बेहद मामूली सा अंतर होगा। लोजपा और बागी उम्मीदवार महागठबंधन और एनडीए के लिए मुसीबत बनेंगे, इसमें कोई शक नहीं।
राजपुर विधानसभा क्षेत्र
अबकी चुनाव में राजपुर विधानसभा क्षेत्र पर सभी की निगाहें हैं। दरअसल, यहां से नीतीश मंत्रिमंडल में परिवहन मंत्री बने संतोष कुमार निराला मैदान में हैं। जीत की हैट्रिक लगाने की प्रत्याशा में मैदान में उतरे निराला को महागठबंधन के विश्वनाथ राम कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनौती दे रहे हैं। वैसे यहां से कुल 14 प्रत्याशी मैदान में हैं। हर किसी के पास अपनी जीत का अलग -अलग तर्क है। बसपा के संजय राम और लोजपा के निर्भय कुमार निराला यहां के मुकाबले को दिलचस्प बनाने में जुटे हैं, पर चुनाव से एक पखवाड़ा पहले तक की उनकी तैयारी ऐसी नहीं दिखती कि वे कोई बड़ा उलटफेर यहां कर पाएं। मंत्री होने के बाद भी निराला अपने क्षेत्र के लोगों के लिए कोई ऐसा उल्लेखनीय काम नहीं कर पाए, जिसका डंका इस चुनाव में वे बजा सकें। उलटे कांग्रेस के लोग जरूर चिल्ला- चिल्ला कर बता रहे हैं कि उन्होंने बक्सर सदर से कांग्रेस के विधायक मुन्ना तिवारी के गांव कोरानसराय जाने वाली नारायणपुर- मठीला- कोरानसराय सड़क का जीर्णोद्धार होने नहीं दिया। सच क्या है, यह तो निराला ही बता सकते हैं। उनके ही क्षेत्र के मनोहरपुर गांव के लालू यादव और रवि नारायण उपाध्याय कहते हैं कि मंत्री जी से बड़ी उम्मीद थी, पर एक बार वे पटना क्या गए, हमलोगों को भूल ही गए। आखिरी बार उन्हें कब देखा, याद नहीं। मुख्य सड़क से उनके गांव की दूरी सिर्फ 75 मीटर है, लेकिन लोगों को मोटरसाइकिल या गाड़ी से आने के लिए दो किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। यह सिर्फ बड़ी नहर पर पुल नहीं बनाने के कारण है। ऐसा नहीं कि पुल बनाने का प्रयास पहले नहीं हुआ। लेकिन, कमीशन देकर ठेके लेने की प्रवृति के कारण पुल की ढलाई भरभरा कर गिर गई। इसके बाद न पुल का निर्माण हुआ और न ही संबंधित ठेकेदार ही दिखा। ग्रामीण व स्कूली बच्चे इसी टूटे पुल के पाए पर डाले गए बिजली के चार पोल के सहारे नहर पार करते हैं। अब तक आधे दर्जन लोग यहां नहर में गिर कर मौत के शिकार हो चुके हैं या अपंग हो गए हैं। वहीं, बैरिया के बैजनाथ सिंह कहते हैं कि पूरे क्षेत्र के लोगों को संतुष्ट करना संभव नहीं है।
ब्रह्मपुर विधानसभा क्षेत्र
बक्सर जिले में इस समय ब्रह्मपुर विधानसभा क्षेत्र मीडिया के लिए खास है। कारण साफ है...यहां पूर्व विधान पार्षद बाहुबली हुलास पांडे लोजपा के टिकट पर मैदान में डंटे हैं। महागठबंधन की ओर से राजद के शंभुनाथ यादव और एनडीए की ओर से विकासशील इंसान पार्टी के जयराज चौधरी चुनावी विसात पर गोटियां सजाने में जुटे हैं। यहां से कुल 14 प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें से अधिकतर सिर्फ इसलिए मैदान में हैं कि कहीं बाबा ब्रह्मेश्वर की कृपा बरस गई तो वे बाजी मार ले जाएंगे। यहां जातिगत समीकरण मायने रखता है। पिछले चुनाव में जेडीयू का साथ मिलने के कारण शंभु नाथ यादव की जीत का द्वार खुला था। इस बार जेडीयू एनडीए के जयराज चौधरी के साथ है। जयराज चौधरी पहली बार चुनाव मैदान में उतरे हैं। आमलोगों के बीच उन्हें अभी पैठ बनानी है। बेहद कम समय के कारण उन्हें पवन वेग से काम करना होगा। लोजपा के टिकट पर मैदान में उतरे हुलास पांडे युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं।
इसी क्षेत्र की कांट पंचायत के शंकर साव कहते हैं कि चुनाव दिलचस्प है। परिणाम चाहे जो हो पर मुकाबला कांटे का होगा। यहां सबसे बड़ी समस्या शिक्षा की है। जो भी जनप्रतिनिधि हों, उन्हें इस पर काम करना होगा। अफसर और बड़े लोगों के बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं पर हम जैसों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं, जहां शिक्षा की गुणवत्ता जीरो है। बगेन तिराहे पर मिले मुस्तकीम बोलना नहीं चाहते। कुरेदने पर सिर्फ इतना कहते हैं, जातीय समीकरण को जो साध ले, वही जीतेगा। यहां अब तक जितनी तस्वीर साफ हुई है, उसमें यह साफ -साफ दिखने लगा है कि मुकाबला त्रिकोणीय होगा।
डुमरांव विधानसभा क्षेत्र
डुमरांव विधानसभा क्षेत्र से पिछले चुनाव में जदयू के टिकट पर ददन यादव उर्फ ददन पहलवान चुनाव जीते थे। इस बार पार्टी ने उनकी जगह अंजुम आरा को मैदान में उतारा है। टिकट की बाजी में चित्त हो गए ददन इसके बाद भी मैदान में हुंकार भर रहे हैं। हालांकि, वे निर्दलीय हैं। महागठबंधन की ओर से भाकपा माले के अजीत कुमार सिंह झंडा बुलंद कर रहे हैं। लोजपा ने अखिलेश कुमार सिंह को उतारा है। यहां से कुल 18 प्रत्याशी मैदान में हैं और यह जिले में सर्वाधिक है। माना जा रहा है कि ददन के मैदान में उतरने से एनडीए के वोट बैंक में सेंधमारी हो सकती है। हालांकि, उनके विरोधी यह कहने से गुरेज नहीं करते कि हेलीकाप्टर की सवारी के शौकीन ददन का विधानसभा पहुंचने का सपना इस बार हवा- हवाई ही साबित होगा। प्रवक्ता से सीधे चुनावी जंग में उतरी अंजुमआरा के लिए पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं और सहयोगी भाजपा के वोट बैंक को अपने पाले में लाने की बड़ी चुनौती है। हालांकि, उनके चुनावी कर्ताधर्ता इस काम को तेजी से अंजाम देने में जुट गए हैं। महागठबंधन के अजीत कुमार सिंह की राह में राजद से बगावत कर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे सुनील कुमार बाधा बन रहे हैं।
डुमरांव में विकास कार्यों की शहनाई बेहद धीमी बजी है।मुरार के मुन्ना बताते हैं कि इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है। लॉकडाउन ने रही सही कसर पूरी कर दी। इस क्षेत्र के अधिसंख्य युवा बेरोजगार हैं। वहीं, डुमरांव के मुरली बताते हैं कि सड़क जाम से कोई तो जल्द निजात दिलाए।स्टेशन पर फुट ओवरब्रिज नहीं होने के कारण आए दिन दुर्घटनाएं होती हैं। रेलवे पर दबाव जब तक स्थानीय जनप्रतिनिधि नहीं बनाएंगे, यह काम नहीं हो सकता। वे कहते हैं कि जनप्रतिनिधि ऐसा हो जो सिर्फ अपनों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पूरे क्षेत्र को अपना समझे।
इस ऐतिहासिक क्षेत्र में एनडीए और महागठबंधन के बीच के सीधे मुकाबले को ददन यादव और राजद के बागी सुनील कुमार एक अलग रंग देने में जुटे हैं। सबकी नजर इन दोनों के कदमों पर टिकी है।
बक्सर विधानसभा क्षेत्र
बक्सर विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी ने परशुराम चतुर्वेदी को मैदान में उतारा है, जबकि महागठबंधन की ओर से कांग्रेस के निवर्तमान विधायक संजय कुमार तिवारी उर्फ मुन्ना तिवारी एक बार फिर से विधानसभा पहुंचने की जुगत में हैं। यहां कुल चौदह प्रत्याशी चुनावी दुंदभी बजा रहे हैं। आश्वासनों की रेवड़ी यहां खूब बांटी जा रही है। बदले में बस एक जीत। अधिसंख्य मतदाता खामोशी की चादर ओढ़े बैठे हैं। रामरेखा घाट के पास मिले युवा आदित्य पांडे कहते हैं कि बक्सर की राजनीति ही जातपात वाली है। जब तक लोग इससे आगे नहीं बढ़ेंगे विकास की बात कैसे सोच सकते हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है। शिक्षा का पतन हो रहा है। युवाओं को अच्छी पढ़ाई के लिए बनारस या आरा का मुंह देखना पड़ रहा है। इन बातों को हम तवज्जो ही नहीं देते। अब वक्त आ गया है कि वोट मांगने को आने वाले लोगों से यह सवाल पूछा जाए। शहर के ही चंद्रबलि सिंह भी आदित्य की बातों से सहमत थे। यहां मिले बुजुर्ग रामजी चौधरी ने कहा कि लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव आश्वासनों की रेवड़ी हमें खूब मिलती है। चुनाव के करीब आते ही सड़क और ओवरब्रिज के निर्माण की बात होने लगती है। पिछले चार चुनावों से यही कहानी दुहराई जा रही है। पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय को टिकट नहीं मिलने के मुद्दे पर वे मुस्कराते हैं और कहते हैं कि उन्हें टिकट ही क्यों मिलना चाहिए। वे तो डीजीपी रहते हुए अपने क्षेत्र की खूब सेवा कर सकते थे। वहीं, युवा दिनेश कहते हैं कि भाजपा के कार्यकर्ता रह चुके निर्दलीय प्रत्याशी आकाश कुमार सिंह जिस तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, वह दलीय प्रत्याशियों की मुसीबत बढ़ा दे तो कोई बड़ी बात नहीं। बहरहाल, गंगा के तट पर बसे इस शहरी क्षेत्र के मतदाता बेसब्री से 10 नवंबर की बाट इस प्रत्याशा में जोह रहे हैं कि चौसा के आम की तरह परिणाम भी उनके मन के अनुकूल होगा।
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----कुमार भवानंद-----
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Tuesday, April 11, 2017
Sunday, July 17, 2011
प्यार तो ज़िन्दगी का अफसाना है!
इसका अपना ही एक तराना है!
पता है सबको मिलेंगे सिर्फ आंसू!
पर न जाने दुनिया में हर कोई क्यों इसका दीवाना है!
Saturday, July 16, 2011
बॉलीवुड में बुंदेलखंड का डंका बजाने की चाहत
‘ढड़कोला’ और ‘बुंदेलखंडी डॉन’ फिल्म में अपने सधे अभिनय के बूते अपनी अलग पहचान स्थापित करने वाले देवदत्त इन दिनों कलर्स, एनडीटीवी इमेजिन, स्टार प्लस, सहारा वन आदि चैनलों पर चल रहे कई सीरियल में अलग- अलग किरदारों में अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दे रहे हैं। एनडीटीवी इमेजिन पर प्रसारित शाकुंतलम प्रोडक्शन द्वारा निर्मितधारावाहिक ‘देवी’ में ग्रामीण की भूमिका में वह अपने अभिनय का नया आयाम स्थापित कर चुके हैं। वहीं, कलर्स पर प्रसारित सीरियल ‘ये प्यार न होगा कम’ में एक गरीब रिक्शावाले की भूमिका में वह दर्शकों को बांधने में सफल रहे। इसी चैनल पर प्रसारित बहुचर्चित सीरियल ‘लाडो’ में भगनू के किरदार में उनके जीवंत रोल को लंबे समय तक लोग याद रखेंगे। एनडीटीवी इमेजिन पर प्रसारित धारावाहिक ‘काशी’ में नौकर बने देवदत्त अपने किरदार से यूं घुल मिल गए दिखे मानो यह पात्र उन्हीं के लिए रचा गया हो। इसी तरह, स्टार प्लस पर ‘राजा की आएगी बारात’ में भी वह अपने अभिनय का अमिट छाप छोड़ने में सफल रहे हैं। सहारा वन पर प्रसारित धारावाहिक ‘छोटी बहू’ और ‘गणेशलीला’ तथा कलर्स पर ‘ऐसे न करो विदा’ में भी अलग- अलग किरदारों में वह दिख चुके हैं। आने वाले दिनों में वह सोनी पर प्रसारित ‘सीआईडी’ और ‘आहट’ में भी दिखेंगे। इसके लिए आडिशन दे चुके हैं।
बुंदेली फिल्मों में बतौर हीरो काम करने वाले देवदत्त धारावाहिकों में चरित्र भूमिकाएं निभाने के सवाल पर कहते हैं कि उनके आइडियल शाहरुख खान भी सर्कस जैसे सीरियल के माध्यम से फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने में सफल रहे थे। उनके लिए भी ये टीवी धारावाहिक फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने का एक जरिया हैं। वह बताते हैं कि इरफान खान की फिल्म में लीड रोल के लिए उनका आडिशन लिया गया था, जिसमें वह सफल रहे हैं। अभी इसका नाम तय नहीं किया गया है, लेकिन जल्द ही यह फिल्म फ्लोर पर होगी। बुंदेली भाषा में बनी फिल्म ‘मकान आपका, हमारे बाप का’ भी जल्द ही रिलीज होगी। इसके अलावा ‘मां वैभव लक्ष्मी’ भी रिलीज होने वाली है। इस फिल्म में उनके साथ जाने- माने भजन गायक अनूप जलोटा भी हैं, जो उनके गुरु की भूमिका में हैं। वह बताते हैं कि मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ में भी उन्हें अभिनय का मौका मिला। उन्हें यह स्वीकार करने में झिझक नहीं कि अभी बुंदेलखंडी फिल्म इंडस्ट्री शैशवावस्था में है। इसके लिए इस क्षेत्र के राजनीतिज्ञों और कलाकारों को ठोस पहल करनी होगी। समवेत पहल से भोजपुरी फिल्मों की तरह बुंदेलखंडी फिल्मों का भी अपना मार्केट होगा और यहां के कलाकार भी देश- विदेश में अपनी पहचान कायम करने में सफल रहेंगे। वह बताते हैं कि ढड़कोला को वह सीरियल के तौर पर एक बार फिर से दर्शकों के सामने लाना चाहते हैं। इसके लिए बालाजी फिल्म्स की सर्वेसर्वा एकता कपूर को उन्होंने प्रस्ताव दिया है। सब कुछ ठीक रहा तो तेरह एपीसोड में धारावाहिक के रूप में इसे प्रसारित किया जाएगा।
- कुमार भवानंद
जिज्ञासा से शुरू होता है जीवन: श्री श्री रविशंकर
जीवन क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
- जिज्ञासा से मानव जीवन शुरू होता है। पूर्णत्व प्राप्त करने पर ही मानव पूर्ण आकार लेता है। जीवन साधना सिखाती है। साधन सामग्री जुटाने में ही जीवन गुजारना इस मानव जीवन का उद्देश्य नहीं है।
मोक्ष और पुनर्जन्म की अवधारणा में विरोधाभास क्यों है? आत्मा अजर -अमर रह कर देह में प्रवेश करती हो तो फिर मोक्ष कहां मिला?
- इसमें विरोधाभास जैसी कोई बात नहीं है। आत्मा की मर्जी से ही मुक्ति मिलती है। जन्म से मुक्ति की इच्छा जुड़ी है। मुक्ति की इच्छा जिसमें नहीं जगती उसमें भक्ति जागृत होती है।
आप अक्सर अपने सत्संग के दौरान कहते हैं कि प्रेम ही सबसे बड़ा तत्व है। आज की आपाधापी भरी जीवन शैली में प्रेम कैसे पैदा हो?
- प्रेम जीवन के लिए वाकई सबसे बड़ा तत्व है। लेकिन, यह बेहोशी की हालत में पैदा नहीं हो सकता है। प्रेम पैदा करने के लिए आपाधापी भरी जीवन शैली कतई बाधक नहीं है। होश में रहें तो प्रेम की धारा स्वत: बहेगी।
क्या आप मानते हैं कि उपदेशों का लोगों पर प्रभाव पड़ता है? यदि हां तो फिर क्या कारण है कि सन 2002 में आपकी बिहार यात्रा के दौरान रणवीर सेना, सीपीआईएम, पीपुल्स वार ग्रुप तथा माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के एक लाख युवाओं ने अहिंसा के संदेश के प्रचार की प्रतिज्ञा की। इन लोगों ने प्रतिज्ञा को निभाया तो फिर नक्सलवाद क्यों नहीं थमा?
- उपदेश का प्रभाव पड़ता है। कौन कहता है कि बिहार में नक्सलवादियों की गतिविधियां नहीं थमीं। उनके सत्संग के बाद से क्या बिहार में कभी नरसंहार की घटनाएं सामने आईं? वहां पहले बड़े - बड़े नरसंहार हो चुके थे। सत्संग के बाद एक हजार से अधिक नक्सली देश की मुख्य धारा में जुड़े। मणिपुर, झारखंड जैसे राज्यों में हिंसा की घटनाएं काफी कम हो चुकीं हैं। उग्रवादी संगठन से जुड़े मणिपुर के कई लोगों को पुने आश्रम में रख कर उन्हें समाज से जुड़ने के लिए प्रेरित किया गया है। इतना ही नहीं तीन सौ से अधिक लोगों को असम राइफल्स के कैंप में रख कर उन्हें जीवन जीने की कला सिखाई गई है। कार्ल मार्क्स की विचारधारा यदि उनके दिमाग में पैठ सकती है तो क्या देश के प्रति उनकी जिम्मेदारी की बात नहीं बैठ सकती है। हमने उन्हें यही बताया है। नतीजा हर स्थान से सकारात्मक आए हैं।
क्या सुदर्शन क्रिया हमें सभी रोगों से मुक्त करने में सक्षम है?
- सुदर्शन क्रिया से कैंसर और तनाव खत्म होने के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। एम्स और निमहैन्स के चिकित्सा विशेषज्ञ इसे कसौटी पर कसने में जुटे हैं। योग को मेडिकल साइंस ने भी मान्यता दी है। अब तो चिकित्सक भी रोगियों को योग की सलाह देते हैं। वैसे भी हम क्वांटम फिजिक्स को क्यों भूल जाते हैं।
क्या आपको लगता है कि एक दिन आप अपनी बात लोगों को मानने को विवश कर देंगे। यदि हां, तो वह दिन कब आएगा?
मैं कभी भी लोगों को किसी बात के लिए विवश नहीं करता। उन्हें बताता हूं। जैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम में किसी से जीवन पर्यंत रिश्वत नहीं लेने की शपथ कभी नहीं दिलाता। उनसे सिर्फ एक साल तक की शपथ लेने की बात कहता हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि अधिसंख्य लोग एक दिन पूरी तरह से भ्रष्टाचार या अन्य सामाजिक बुराइयों से खुद को दूर कर लेंगे। जहां तक शत प्रतिशत लोगों की बात है इसे लेकर वह कोई दावा नहीं करते। स्प्रिचुअल प्रैक्टिस से विचारधारा जमती है।
किसी वस्तु की इच्छा क्या अनुचित है?
इच्छा ही जीवन नहीं है। जीवन इससे भी महत्वपूर्ण है। इच्छा की पूर्ति होने पर क्या इच्छा थम जाती है? नहीं न। वस्तुत: यह और विस्तार पाती है।
अन्य संतों, महात्माओं, योगियों से आप अपने को कैसे अलग मानते हैं? आजकल फर्जी और तिकड़मी गुरुओं की भरमार है। क्या ऐसे लोगों की वजह से गुरु- शिष्य परंपरा की वैदिक परंपरा खत्म नहीं हो जाएगी?
फर्जी गुरु तो हर काल में रहे। रावण को हम क्यों भूल जाते हैं, जिन्होंने छल कर सीता का अपहरण किया था। गुरु- शिष्य की परंपरा कभी खत्म नहीं होगी।
उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड को लेकर आपकी संस्था क्या कदम उठाएगी?
इस समय तो हम उत्तर प्रदेश की बात कर रहे हैं। सोनभद्र से इसकी शुरुआत हो चुकी है। झांसी से मैं खुद इस अभियान का आगाज कर रहा है। उत्तर प्रदेश जातिवाद से बुरी तरह से जकड़ा हुआ है। इसी कारण यहां विकास की गति थम गई है। बुंदेलखंड के लिए भी हम सोचेंगे। बरुआसागर में लोगों की काफी मांग रही है। जमीन व अन्य सुविधाएं मिलीं तो हम कुछ अच्छा करेंगे, लेकिन इस समय ठोस तरीके से कुछ भी कहना संभव नहीं हो पाएगा। अब तक यूपी पर फोकस नहीं करने का मुख्य कारण यहां कार्यकर्ताओं का अभाव रहा है। अब लोग सामने आने लगे हैं।
-कुमार भवानंद