Tuesday, April 11, 2017

बापू, हमें फिर चाहिए आपका साथ
(चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह)
कुमार भवानंद
मुजफ्फरपुर, 10 अप्रैल 2017
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बापू, हम सौ साल पहले लौटना चाहते हैं। इसलिए नहीं कि इन वर्षों में हमने विकास की जिन सीढ़ियों को नापा है, वह हमें पसंद नहीं, बल्कि इसलिए कि आपके संदेश को जिस तरह हमने तब आत्मसात किया था, उसे लेकर हम चलने में अब सक्षम नहीं दिख रहे। सत्य, अहिंसा और भाईचारे के संदेश से हम दूर चले आए हैं। अपराध के बढ़ते ग्राफ से हर कोई चिंतित है। कोर्ट कचहरी में लंबित मामले बता रहे हैं कि भाईचारे से हम दूर हटते जा रहे हैं। बात- बात पर तू- तड़ाक अब यहां आम है। 
आज आपको हम ठीक सौ साल बाद उसी स्टेशन पर उतरते देखेंगे, जहां आपने पहली बार  इस तीन नदियों और तीन भाषाओं के संगम से बने तिरहुत की धरती पर पहला कदम रखा था। हम तब भी परेशान थे। उस समय हम अंग्रेजी हुकूमत के तीनकठिया कानून से तंग थे। यह कानून हमें किसान से मजदूर बना रहा था। फिरंगियों के दमन से हम तबाह हो रहे थे। समाज में भय का वातावरण था। लेकिन, आपके चरण यहां पड़ते ही समाज ने एक नई करवट ली। हमें आपने वह मजबूती दी कि हमने ईस्ट इंडिया कंपनी के बहाने देश की सत्ता पर काबिज हुए अंग्रेजों को उस काले कानून को बदलने के लिए मजबूर कर दिया।   
एक शताब्दी यानी लगभग तीन पीढ़ियों के गुजरने का वक्त होता है, इसलिए हम कुछ समय की मार से तो कुछ खुद के स्वार्थ से आपके बताए रास्ते से भटकते  दिख रहे हैं। लेकिन, अब भी हम भावनात्मक रूप से मरे नहीं हैं। तभी तो सौ साल बाद एक बार फिर से आपको इस धरती पर उसी अंदाज में लौटाने की तैयारी में जुट गए हैं। ऐसे में आप हमें नए सिरे से जीने की उसी कला से रूबरू करा सकते हैं, जिसमें सादा जीवन उच्च विचार का समावेश हो। अपराध व जात- पात के लिए कोई जगह न हो। अच्छे काम के लिए संघर्ष करने की जीवटता हर इंसान में हो। आलस्य हमें छूकर भी न जाए। कर्मठता लोगों की दिनचर्या में शामिल हो, ताकि इस तिरहुत की धरती को आपके बताए रास्ते पर चलकर पुन: एक और नई पहचान मिले। 

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