Saturday, July 29, 2023

छह फुट की झोपड़ी, बांस से बने मचान, इस पर साथ - साथ सोते पशु और इंसान


यहां गंगा बहती  रही, पर जीवन ठहर गया: तीन दशक  में कटाव के कारण पचास से अधिक गांव का अस्तित्व मिटा


ग्राउंड रिपोर्ट
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- कभी 9-10 बीघा जमीन के मालिक थे, पक्का मकान था, अब  कर रहे  मजदूरी, बांध पर बसेरा
- सरकारी इमदाद चटनी जैसी, वह भी एक फीसदी से कम को ही मिली, बाकी अपने भाग्य भरोसे
-जाह्नवी चौक से तिनटंगा करारी  तक बना तटबंध अब कटाव पीड़ितों की जिंदगी का अहम हिस्सा
- घोरघट से पीरपैंती और नारायणपुर से रंगरा तक सड़कों के किनारे जीवन गुजारना बनी मजबूरी  


कुमार भवानंद

भागलपुर।  यहां गंगा तो लगातार बह रही है, पर इसके किनारे बसे लोगों का जीवन ठहर गया है। गंगा की हद में रहने वाले लोग नदी के जलस्तर में लगातार हो रही बढ़ोतरी से दहशत में हैं। खास कर वे लोग अधिक सहमे- सहमे से हैं जो गंगा के कटाव में अपना सब  कुछ पहले ही गंवा चुके हैं।  घोरघट से पीरपैंती और नारायणपुर से रंगरा तक सड़कों के किनारे जगह छेंकने की जद्दोजहद शुरू हो चुकी है।  दरअसल, बाढ़ के तीन महीने इस इलाके के लोगों का ठिकाना बदल जाता है। जो पहले से यहां टिके हैं, वे अपने आशियाने (झोपड़ी) को  दुरुस्त करने में जुट गए हैं। पूर्वी बिहार की बात करें तो पिछले तीन दशक में गंगा के कटाव में यहां के पचास से अधिक गांव का अस्तित्व मिट चुका है। इन गांवों में रहने वाले कुछ किस्मत के धनी लोग सुरक्षित स्थानों पर जा बसे हैं, जबकि अधिसंख्य आबादी अभी भी तटबंध पर कई वर्षों  से जीवन गुजार रहे हैं। यहां छह फीट की झोपड़ी में कुछ ऐसे लोग भी रहते हैं, जो कटाव की चपेट में आने से पहले 9 -10 बीघा जमीन के मालिक थे, उनका आशियाना पक्के का था। खेती- किसानी अच्छी थी, इसलिए जीवन शानदार था। पर, अब सब कुछ  बदल चुका है। स्थिति यह है कि जिस मचान पर उनकी रात कटती है, उसी के किनारे उनके पशु भी बंधे रहते हैं। ऐसे लोगों को सरकारी मदद तो मिली पर वह नाकाफी थी। कुछ लोगों को ही इंदिरा आवास या जमीन का पर्चा मिला।  सबसे अधिक बदहाली जाह्नवी चौक से तिनटंगा करारी तटबंध की दिखी। नदी जल विशेषज्ञ इंजीनियर दिनेश मिश्र की मानें तो बिहार में गंगा के कटाव का सबसे अधिक सामना भागलपुर को करना पड़ता है। वहीं, कटिहार के मनिहारी से सटे कुछ हिस्से इससे प्रभावित हैं। फरक्का बैराज बनने के बाद गंगा की पेटी ज्यों- ज्यों भर रही है, पानी का फैलाव बढ़ रहा है और कटाव की गति भी तेज हो रही है।


 सिर्फ बाढ़ से बचाव का ही नहीं लोगों के सब्र का भी यह बांध 
महादेवपुर से तिनटंगा करारी तक करीबन 19  किलोमीटर लंबा तटबंध कटाव पीड़ितों का ठिकाना बन चुका है। इसके दोनों तरफ जिंदगी बसती है, चाहे इंसानी हो या पशुओं की। सब  एक साथ। कौन किसके घर में रह रहा है यह बताना मुश्किल। एक हजार से अधिक परिवार। छह फीट की झोपड़ी में साथ रहने  को बेटा भी है, बहू भी। यानी यहां परदा सिमट चुका है। चिलचिलाती धूप या मूसलधार बारिश या हाड़ कंपाती ठंड। उनकी दुनिया इसी में लगभग डेढ़ दशक से सिमटी हुई है। 2008 में कटाव के कारण बुद्धुचक से विस्थापित हुए आठ बीघा खेतिहर जमीन के मालिक रहे महिचंद्र सिंह के मुताबिक 2200 से अधिक घर का यह गांव देखते- देखते विलीन हो गया। नौकरी करने वाले लोग तो यहां- वहां बस गए, पर जिनके पास सिर्फ खेती बाड़ी थी, वे सब  भूख मिटाने को मजदूर बन गए। सरकारी मदद नहीं मिली तो उन जैसे करीब चार सौ परिवार इस बांध पर झोपड़ी डाल कर रह रहे हैं।  शंकर सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। दरोगी मंडल की मानें  तो गांव में आठ सौ पक्का के घर थे। वे जिस मचान पर लेटे थे, उसी पर उनकी बकरी बैठी थी, नीचे अन्य पशु बंधे थे। बोचाही में बांध पर मिली कमलाकुंड की विकला देवी के आधे परिजन गंगा के इस पार तो आधे दक्षिणी हिस्से में बस गए। इसी तरह, नवटोलिया से विस्थापित निखिल, प्रदीप और सुमन का दर्द यह कि वोट लेने वाले नेता उनकी ओर देखते भी नहीं। वे बताते हैं कि बाढ़ से पहले वे बांध के नीचे रहते हैं, लेकिन पानी बढ़ते ही बांध ही उनका ठिकाना होता है। हर परिवार की यहां एक झोपड़ी है। टिन की नाव फिर से तैयार की जा चुकी है, ताकि पानी  बढ़ने पर  पशुचारा लाया जा सके। गोपालपुर के स्पर 6 व 6  एन पर मिले अमलेश बताते हैं कि सबसे मुश्किल अब शौच निवृति में होगी। बाढ़ में बांध तक लबालब पानी, ऐसे में रहें कहां और शौच कहां जाएं, यह बड़ा संकट रहता है। सांप और बिच्छू उनके जीवन में पहले से ही घुले जहर को और गहरा कर देते हैं।


गंगा के कटाव से तीन दशक में विस्थापित हुए प्रमुख गांव
 नारायणपुर प्रखंड में शाहाबाद, गंगापुर मंडल टोला और ब्राह्मण टोला, गोरियासी, कसमाबाद, नारायणपुर, दुधैला पूर्व और पश्चिम, फुलवरिया, साहू टोला, बिशनपुर, मौजमा दुधैला, चौहद्दी गांव, नाथनगर में शंकरपुर, चौवनिया, अठगामा, बुद्धुचक टोला , शंकरपुर बिंदटोला, अजमेरीपुर बिंद टोला, खरीक में सुंगठिया, हरिजन नवादा, छोटी अठगामा का आधा हिस्सा,
इस्माइलपुर प्रखंड में फुलकिया, इदमादपुर, अकावा, कमलाकुंड, नवटोलिया, बोचाही आंशिक रूप से, गोपालपुर में बिंद टोला, तिनटंगा दियारा, बुद्धुचक,  सबौर प्रखंड में बलुवाचक, मोदीपुर,  इंग्लिश, कहलगांव का तौफिल, अठनिया, कहलगांव रानी दियारा और पीरपैंती रानी दियारा पूरी तरह से गंगा में विलीन हो  चुका है। गंगा को लेकर आंदोलन करने वाले रामकिशोर के मुताबिक ये सभी  गांव ऐसे हैं, जिनमें आठ सौ से दो हजार परिवार तक रहते थे। इसके अलावा छोटे-  छोटे कई गांव गंगा की गोद में समा चुके हैं। यहां रहने वाले अधिकतर लोग इसी नाम से गांव बसाकर कहीं इकट्ठा रह रहे हैं तो कुछ यहां- वहां सुरक्षित स्थानों पर चले गए। बड़ी आबादी बांधों और सड़कों के किनारे बसी हुई है। डीएम सुब्रत कुमार सेन ने कहा कि सालभर के अंदर करीब 1500 भूमिहीनों को बसने के लिए जमीन दी गई है। इन लोगों को डुमरिया सहित कई स्थानों पर प्रधानमंत्री आवास योजना से घर भी दिए गए हैं। शेष कटाव पीड़ितों को भी जल्द ही जमीन आवंटित की जाएगी। 


अब न हो ऐसे हालात, इसके लिए ठोस इंतजाम 
गंगा किनारे बसे गांवों को कटाव से बचाने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है। तिनटंगा  और कटिहार जिले में नदी की पाट को चौड़ा किया गया है, ताकि पानी का निर्बाध बहाव हो। इसके अलावा तटबंधों पर स्पर बनाए गए हैं, जिससे नदी  आबादी वाले क्षेत्र की ओर न बढ़े। विभाग के कर्मचारी हर किलोमीटर पर निगरानी के लिए तैनात किए गए हैं। कैंप कार्यालय भी खोला गया है। 
 शैलेंद्र,  इंजीनियर इन चीफ, सिंचाई विभाग, बिहार





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